Sunday, November 01, 2026

Kiraye Ka Shehar......,

जब लोग कहते.......,
ये शहर मेरा है, 
अक्सर मुस्कुरा देती हूँ मैं, 
क्यूँकि,जनाब सिर्फ यहाँ पता दर्ज़ होता है, 
अपनापन नहीं, 
जिस कमरे में रहती हूँ मैं, 
उन दीवारों पर लगी,किसी और की कीलें, 
बालकनी से दीखता,आसमां भी उधार का, 
हर महीने किराया तो चुक जाता, 
पर घर होने का एहसास,
हर बार बकाया रह जाता, 
यहाँ रिश्ते भी किराये के होते, 
जरुरत तक साथ चलते फिर, 
अनुबंध के जैसे,चुपचाप अंत होते, 
समय यहाँ किसी के पास नहीं, 
क्यूँकि, सब भाग रहे, 
सुबह हमारी कंपनी की, 
दोपहर लंबी कतार लक्ष्यों की, 
शाम करे हम ट्रैफिक के हवाले, 
और रात हमारी मोबाइल संभाले, 
इस शहर में हैं,लाखों खिड़कियाँ, 
पर बहुत कम ऐसी जो इंतज़ार में खुलती, 
लिफ्टें हमें हर मंज़िल तक छोड़ आती, 
पर कदम हमारे पड़ोस तक नहीं पहुँच पाती,
संपर्क सूची तो लंबी हो गयी हमारी,
पर संवाद हो गया है छोटा, 
जब माँ कहती अपना ख़्याल रखना, 
फ़ोन पर पिता कहते सब ठीक है ना ?
इन दोनों के बीच ठहरा जो मौन है, 
वही है सबसे महँगा किराया,
जो कभी कहीं दर्ज़ नहीं होता,
शहर ने छत तो दी,पर आँगन नहीं, 
रोज़गार तो दिया,पर इत्मीनान नहीं, 
लाखों की भीड़ दी,पर कोई अपना नहीं, 
एक दिन मैं भी,ये कमरा छोड़ दूँगी, 
कोई और आएगा, 
अपना बिस्तर बिछायेगा, 
अपने सपनों को,इन्हीं दीवारों के सहारे रखेगा,  
ये शहर उसे भी,उतना ही अपना लगेगा, 
जितना मुझे कभी लगा था, 
किराया सिर्फ़ मकान का नहीं चुकाया, 
हर सपना, थोड़ा बचपन, 
हर सफलता, कुछ रिश्ते,  
हर पहचान, थोड़ी मासूमियत,
हर शहर उसमें बसने वालोँ से, 
उसका एक हिस्सा,  
हम किराए के शहर में नहीं, 
बल्कि किराए की ज़िंदगी में रह रहे,
जहाँ साँसें हमारी,पर समय किसी और का,
रास्ते हमारे,पर मंज़िलें उधार की,
और जब लौटने का समय आता,
इंसान अपने साथ,सिर्फ़ वही ले जा पाता,
जिस पर,
कभी किसी का किराया नहीं लगता —
प्रेम, स्मृतियाँ और मनुष्यता।

Tuesday, October 06, 2026

Maun ki Matribhasa

शब्दों की भी एक उम्र होती है...., 
इनके जनम से पहले, 
धरती ने भी मौन में ही, पहली बारिश सुनी होगी, 
जब माताओं ने बिना कुछ कहे, 
पहली बार अपने बच्चों को समझा होगा, 
तभी शायद जन्मी होगी "मौन की मातृभाषा,
जिसे कोई स्कूल नहीं पढ़ाता - सिखाता, 
पर जनम से हर कोई है इसे जानता,   
पिता की चुप्पी में, घर की अधूरी छत, 
बेटी की विदाई और बूढ़े माँ बाप का दवाई ख़र्च,
महीनें के आख़िरी दिनों का हिसाब धीरे - धीरे साँस में,
"सब ठीक होगा " मौन में बोलता एक किरदार,
माँ की चुप्पी, रसोई के धुएँ में नहीं, 
आखिरी रोटी के रूप में पकती है,जो खुद से पहले, 
सबकी थाली में सजती है, उसकी थकान कभी,
शब्द नहीं मांगते, बस बच्चों पर हाथ फेर कर,  
पूरी थकान, उनकी मुस्कराहट पर सह लेती है,
कुछ रिश्ते कभी टूटते नहीं,
बस वो बोलना छोड़ देते है, फिर घर में सुनी दीवारें, 
घड़ी की टिक - टिक, बरतनों की आवाजें और बंद 
दरवाजे के पीछे खड़ा मौन लंबी बातें करते है,
बच्चे अचानक जब शांत हो जाये,
तो समझो शरारत नहीं, उनका भरोसा कही चोट खाया है, 
डर हमेशा रुलाता नहीं, कभी - कभी चुप करवा जाता है, 
पूर्वजों ने, अपने समय की कठिनाईओं को,
अपनी मुट्ठी में भींचकर जी लिया,
पिता ने, उस चुप्पी को जिम्मेदारी का नाम दे दिया, 
और हमने, संस्कार समझ अपनी पीढ़ी को सौंप दिया, 
इस तरह, मौन हमारी विरासत बन गया,
अख़बारों में हम रोज पढ़ते है,
संदेश, टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ, 
उँगलियाँ अब तेज़ हो गई,
एक दूसरे को धीरे - धीरे पढ़ना जो  भूल गई है, 
समाज के चौराहें पर, कुछ सवाल सालों से खड़े है,
जो नारे नहीं लगाते, पत्थर नहीं उठाते, 
बस इंतज़ार करते है, कोई तो, 
उसकी ख़ामोशी को पढ़ ले और विचार करे,
जब मैं अपने भीतर लौटती हूँ,
जहाँ कोई शोर नहीं, आदेश नहीं, तर्क नहीं,
सिर्फ़ सामने मौन बैठा है, जो मुझे पहले से जानता है,
और ये कहता है -
हर आँसू की होती अपनी भाषा है, 
हर मुस्कान का अपना व्याकरण,
जो कभी नहीं कहा, धडकनों के बीच अनकहा सा रहा,
आँखों से निकलकर भी, होंठों तक आते - आते ठहर गया,
यही तो है हम सबकी पहली भाषा, 
"मौन की मातृभाषा"  
   
 


 

Saturday, August 08, 2026

Khamoshi Ka Loktantra...,

कहते है ये लोकतंत्र है...., 
जहाँ हर आवाज को मिला,पूरा गगन है, 
हर जुबां को मिला,बोलने का अधिकार, 
फिर क्यों, लंबी कतार उन शब्दों की है, 
जो जन्म से पहले खो बैठे,अपने अर्थ का आकार, 
लोकतंत्र की हार,बंद पड़ी मतपेटियों में नहीं, 
हमारे अंदर है -
जब प्रश्न पूछने से हमारी आँखें इधर - उधर, 
और उत्तर देने से पहले जहाँ, 
होठों को शब्दों की अनुमति लगती है, 
इन सब की शुरुवात घर से ही तो होती है, 
दादा की चुप्पी संघर्ष थी, 
पिता की चुप्पी कर्त्तव्य, 
हमारी चुप्पी सुविधा बन गई, 
पीढ़ी आगे बढ़ती रही,
और मौन अपना संविधान लिखता रहा, 
ज़िम्मेदारियों का भार शब्दों से,
जाने कब बड़ा हो गया, 
घर धीरे - धीरे समाज बन गया,  
बेटियाँ अपनी इच्छायें, 
डायरी के पन्नों में रखती गयी,
और बेटा असफलता पहनना सिख गया,
इतिहास बोलने वालों को याद रखता है, 
इसलिए, बाज़ारों में आवाज़ें बिकती है, 
चौराहों पर नारे गूँजते है, 
जो उम्र भर सुने जाने की प्रतीक्षा करते है, 
उन्हें कौन जानता है ?
लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं,
संवाद से जीवित रहता है, 
पर मौन, विवेक के हर प्रस्ताव को, 
बिना विरोध के खारिज कर देता है,
स्क्रीन पर सच लिखते - लिखते,
आज हारे चेहरे पढ़ना भूल गए, 
बोलना तो सीखा हमने,पर सुनना भूल गए, 
बोलने की आज़ादी तो,बचा ली हमने,  
पर लोकतंत्र की आत्मा को,ख़ामोश कर गए, 
यहीं से तो ख़ामोशी का लोकतंत्र शुरू होता है, 
इतिहास लिखेगा की लोग बोलते थे -
पर कोई यह भी लिखेगा क्या ?
की सुनने वाले कितने बचे थे ?


Wednesday, July 15, 2026

Arthavyavastha Ke Aaine Mein Bharat..,

सड़कों पर दौड़ती भीड़ की रफ्तार कहती है,

देश आगे बढ़ रहा, हमारी सरकार हमसे कहती है,

ऊँची - ऊँची इमारतों के शीशों में,

विकास निरंतर आगे बढ़ रहा,

कितने लोग है जिन्हें सच नहीं दिख रहा,

चमक रहे शहरों में मॉल और बाज़ार जहाँ, 

खेतों में सिसक रहा किसान यहाँ,

डिजिटल इंडिया की लहर में, डूब रहा हर एक शहर,

पर मज़दूर के चूल्हें में सुलग रही चिता की दोपहर,

बढ़ती जीडीपी के आँकड़े, शेयर बाज़ार के अंक,

अख़बारों की शान तो बढ़ाते हैं,

पर रोज़गार की तलाश में, कितने युवा भटक जाते हैं,

मॅहगाई की रेखा रोज़, छूती नए आसमानों को,

पर कौन सुनेगा, झुग्गी - झोपड़ी में बसने वाले इंसानों को ?

ज़रा ठहरकर गाँव की पगडंडी से भी पूछो,

सूखी पड़ी खेत की मेड़ों की भी कभी सुध लो,

हर मध्यम वर्ग की ये अनकही ज़ुबानी,

आँखों में उम्मीद और मन में लिए परेशानी,

रोज़ी की तलाश में, भटकते हर युवा की कहानी,

महंगाई की इस आँधी में, कितने सपने रोज़ बिखरते हैं,

हमारी रसोई जैसे निरंतर नए बजट में सिमटते हैं,

अर्थव्यवस्था केवल आँकड़ों का खेल नहीं,

GDP की बढ़ती ऐसी रेखा का कोई मोल नहीं,

डिजिटल सपनों के इस युग में,

आर्थिक तरक्की की दौड़ में, हमें संतुलन बनाना होगा,

मशीनरी के इस दौर में, इंसानी हाथों को ताकत में लाना होगा,

जब तक हर थाली में, रोटी और हर हाथों में काम न होगा, 

कैसे कहें तब तक सोने की चिड़िया का सपना साकार होगा !!  


Saturday, July 04, 2026

Mein Badal Rahi Hoon....,

वक़्त के पन्ने पलट कर इसे जाया न कर, 
इक रोज़ सब बदल जायेगा, 
पर ज़िंदगी की कहानी यूँ ही चलती रहेगी, 
बीते वक़्त की किताब से,
आज भी बेनाम रिश्ते निभा रही हूँ,
मैं बदल रही हूँ........,
माना कुछ ख़्वाब अधूरे रह गए,
कुछ लोग भी रास्तों में बिछड़ गए,
मगर टूटे हुए उन टुकड़ों से, 
मैं अपना ही आसमान गढ़ रही हूँ,
मैं बदल रही हूँ.......,
दिल पर दी गयी किसी की चोट का,
या फिर अपनों की कही कोई बात,
ये बात तो रोज का है मौसमी बरसात का, 
न ज्यादा न कम बस जरुरत भर,
जिंदगी से उसके तौर तरीके सिख रही हूँ, 
मैं बदल रही हूँ.......,
जो बातें कभी आँखों से बह जाती, 
अब अल्फ़ाज़ बनकर उतरती है,
मेरा हर दर्द ख़ामोशी से,
आज एक कविता में सँवरती हैं,
अब शिकायत नहीं आईने से,
उससे रोज़ मुलाकात कर रही हूँ,   
मैं बदल रही हूँ.......,
वक़्त ने बहुत कुछ छीन लिया, 
पर खुदको समझने का हुनर दिया, 
कभी मिलो मुझसे तो पहले सा न ढूँढ़ना,
मैं वहीं हूँ, पर ज्यादा ख़ुद जैसी हो रही हूँ,
"मैं बदल नहीं रही"
बस अब किसी और की नहीं, 
अपनी कहानी लिख रही हूँ !!



Friday, June 26, 2026

Sabse Haseen Alfaaz Ho Tum....,

कैसे बताऊ तुम्हें मेरे लिए तुम क्या हो ?
💕
मस्जिद की पहली अज़ान हो तुम, 
माँगा जिसे रोज़ दुआओं में हम ,
रात सिरहाने खुले थे जो ख़्वाब, 
उसकी हसीं शुरुवात हो तुम !! 
💗
सुनहरी धूप की किरण नभ से,
छन - छन आती जमीं पर,
ज़ेहन के जगते सवालों में, 
अकसर हो जाता हूँ मैं ग़ुम !!
💘
ख़ामोशी से नज़रे पढ़ रही,
सुने लम्हों में लिखी किताब, 
चाँद की इस ठंडी रोशनी में, 
सुकून भरी कोई रात हो तुम !!
💑
दो लफ्जों में बट गए मेरे अक्षर,
जिसका पन्ना तूने पढ़ा नहीं,
वाकिफ़ है यहाँ सब मेरे लहज़े से,
पर इन लफ्ज़ों की पहचान हो तुम !! 
💖
लिखना चाहा तुझे कई दफ़े,
खामोशियों में छुपे जज़्बात हो,
मेरी अधूरी सी ग़ज़ल का, 
सबसे हसीं अल्फ़ाज़ हो तुम !!
💝
न सोना, न चाँदी, न कोई ताज़,
बस मेरे हाथों को तेरे हाथों का साथ,
न मिटने वाली उम्र भर, 
उस मोहब्बत का आगाज़ हो तुम !!
💞💞
लगता है वक़्त आज भी वहीं कहीं अटका है,
जहाँ तेरा नाम मेरे ख्यालों में महका है,
यादें तेरी छेड़ जाती हैं दिल में मीठी शरारतें,
लबों पे बिन वजह ठहरती वो मुस्कान हो तुम,   
मेरी अधूरी सी ग़ज़ल का, 
सबसे हसीं अल्फ़ाज़ हो तुम 💫 💕 💫 💕 💫

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कहते है ये लोकतंत्र  है....,   जहाँ हर आवाज को मिला,पूरा गगन है,  हर जुबां को मिला,बोलने का अधिकार,  फिर क्यों, लंबी कतार उन शब्दों की है,  ...

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